स्कूलों में घटता खेल का रुझान

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स्कूल में हफ्ते में एक बार गेम्स खेलने की अनुमति होती है, लेकिन आज कल तो स्पोर्ट्स क्लास के समय पर गणित और विज्ञान के टीचर अपना सिलेबस पूरा करने आ जाते हैं। आइए जानते हैं कि स्कूल में खेल को कम महत्व या ना के बराबर महत्व क्यों दिया जाता है ?

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बचपन में ज़िन्दगी बहुत सरल हुआ करती थी। कुछ समय के लिए होमवर्क करना पड़ता था और अपना बाकी समय हर बच्चा खेल या अपने शौक को देता था। थोड़े से बड़े होने पर माता-पिता और अध्यापकों ने हमें प्रतिस्पर्धा के बारे में बताया। हमें बताया गया कि हमारे रिपोर्ट कार्ड में A ग्रेड होना कितना जरूरी है। अच्छे मार्क्स का मतलब होता है अच्छा करियर। भविष्य में अगर अपने आप को सफल होते हुए देखना है तो अच्छे नंबर लाने पड़ेंगे।

बच्चे भी उस रेस में दौड़ने लगे, जिसका अंत कब होगा उन्हें नहीं पता था, पर माता-पिता और अध्यापक की वो बात कि मार्क्स अच्छे लाओगे, तभी जिंदगी में कुछ अच्छा कर पाओगे, याद करके वो पढ़ाई में इतने लीन हो गए कि अपने दूसरे शौक और खेल को उन्होंने कहीं पीछे छोड़ दिया।

स्कूल में हफ्ते में एक बार गेम्स खेलने की अनुमति होती है, लेकिन आज कल तो स्पोर्ट्स क्लास के समय पर गणित और विज्ञान के टीचर अपना सिलेबस पूरा करने आ जाते हैं। वो सभी बच्चे जो इस ब्लॉग को पढ़ रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि उनके स्कूल में तो नियमित अंतराल पर सोपर्ट्स क्लासेज होती हैं, तो वास्तव में आप बहुत खुशकिस्मत हैं। क्योंकि ज्यादातर स्कूल में स्पोर्ट्स क्लासेज तो होती हैं, लेकिन उसमें शायद ही बच्चों को खेलने की अनुमति होती है।

आइए जानते हैं कि स्कूल्स में खेल को कम महत्व या ना के बराबर महत्व क्यों दिया जाता है-

1.बच्चे का करियर  

भारत में ज्यादातर लोग मध्यम वर्गीय परिवार से होते हैं। यही कारण है कि वो चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में ज्यादा ध्यान दें। माता-पिता और अध्यापक की यह मानसिकता होती है कि खेल को प्राथमिकता देने से बच्चे का करियर बर्बाद हो जाएगा। इसलिए अक्सर बच्चों के अभिभावक और अध्यापक बच्चों को समझाते हैं कि खेल उनका समय बर्बाद करता है और उन्हें खेल की जगह पढ़ाई पर अपना ध्यान लगाना चाहिए।

2.फिजूल खर्च

कई स्कूल और माता-पिता का मानना है कि बच्चों को खेल के क्षेत्र में कुछ सिखाने से उनके पैसे की बरबादी होगी। यही कारण है कि अब स्कूल भी खेल से संबंधित उपकरण पर पैसा खर्च नहीं करना चाहता है। माता-पिता को लगता है कि बच्चे के स्विमिंग क्लासेज, बैडमिंटन क्लासेज, क्रिकेट ट्रेनिंग या बास्केटबॉल ट्रेनिंग पर पैसे खर्च करने से अच्छा है, वो उन पैसों को बच्चे के भविष्य के लिए बचा कर रखें।

3.स्कूल की लापरवाही

कई स्कूल सिर्फ दिखावे के लिए खेल से संबंधित उपकरण रख लेते हैं और खेल शिक्षक रख लेते हैं, लेकिन वास्तव में बच्चों के स्पोर्ट्स क्लास के समय पर या तो गणित के अध्यापक सिलेबस पूरा करने आ जाते हैं, या तो विज्ञान के अध्यापक। माता पिता को भी इससे कोई दिक्कत नहीं होती है, इसलिए स्कूल प्रशासन भी अपने नियम में कोई बदलाव नहीं लाता है।

4.प्रतिस्पर्धा

माता पिता अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करते हैं। दूसरी तरफ, एक स्कूल अपने छात्रों की तुलना दूसरे स्कूल के छात्रों से करता है। अगर एक स्कूल ने 99.04% लाए हैं तो दूसरा स्कूल भी अपने छात्रों और अध्यापकों पर दबाव डालता है कि हमें उस स्कूल की तुलना में ज्यादा नंबर चाहिए। यही कारण है कि जिन बच्चों को खेल में रुचि होती है और जिनके पास खेल में अच्छा प्रदर्शन दिखाने की क्षमता होती है, उन्हें सही साधन नहीं मिल पाता है।

5.खेल मनोरंजन का एक श्रोत है

ज्यादातर लोगों की यह अवधारणा हैं कि खेल मनोरंजन का एक श्रोत है और इससे करियर नहीं बनता है। आज सभी को ओलिंपिक में गोल्ड मेडल तो चाहिए लेकिन खेल में करियर नहीं बनता वाली सोच आज भी लोग रखते हैं। वो अलग बात है कि नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधु, साक्षी मालिक, साइना नेहवाल, बजरंग पुनिया, मीराबाई चानू, रवि कुमार दहिया आदि लोगों ने जब ओलंपिक में मेडल जीता तो पूरे देश में लोगों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशियां मनाई।

6.छात्रों में रुचि की कमी 

छात्रों में रुचि की कमी का सबसे बड़ा कारण यह है कि माता- पिता उनके खेल में करियर बनाने के निर्णय को स्वीकार नहीं करते हैं और स्कूल भी इसी चीज का फायदा उठा कर बच्चों को पढ़ने पर ध्यान देने के लिए कहता है।

इन सभी हालातों को सुधारने का सिर्फ एक ही तरीका है और वो है माता-पिता का बच्चों को खेल के प्रति जागरूक करना। जब माता-पिता खुद बच्चों को खेल का महत्व समझाएंगे तो स्कूल को ना चाहते हुए भी नियमित तौर पर स्पोर्ट्स क्लासेज चलानी पड़ेंगी। आज भारत में ऐसे बहुत से स्कूल्स हैं जहाँ बच्चों को अपने शौक के अनुसार हॉकी, तैराकी, बास्केटबॉल, क्रिकेट, शतरंज, मुक्केबाजी, फुटबॉल, टेनिस खेलने की सुविधा होती है। अगर आप के बच्चे की भी खेल में रुचि है तो उसे वो सारे साधन दें, जिससे भविष्य में वह खेल को अपना करियर बना सकें। सरकार भी इसके लिए काफी पहल कर रही है और कई स्कूल अनिवार्य रूप से खेलों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं, जो काफी सराहनीय है।

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