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हिंदी का सफ़रनामा

Image Source: Think with Niche

Post Highlights

हमने इस बात को स्वीकार कर लिया है और किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है। आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी बाबू को सीखना ही होगा। उसके लिए माँ-बाप पहले खिचड़ी भाषा सिखाते हैं फिर अंग्रेजी मीडियम में दाखिला करवा के अंग्रेजी बाबू को बोलना सिखवाते हैं। भाषा का सम्मान उसके उपयोगकर्ता पर निर्भर होना चाहिए न कि उपयोगकर्ता का सम्मान भाषा पर। कोई व्यक्ति किसी भी भाषा मे अंट-शंट बोले तो उसे अज्ञानी ही माना जाना चाहिए।  पता नहीं कब तक हिंदी जी शर्माती रहेंगी, अंग्रेजी बाबू के सामने। आने वाले समय में कहीं हम इन्हें भूल न जाए। ऐसा होने पर हम अपने मूल आधार को खो देंगे जहाँ से हमने शरुआत की थी। #ThinkwithNiche

हिंदी की उत्पत्ति  

जन-जन की भाषा, भारत माता की भाषा, विश्व के 80 करोड़ की भाषा, हमारी विरासत, हिंदी को हमने आधिकारिक तौर पर 14 सितम्बर 1949 को अपनाया। विविधताओं वाले इस राष्ट्र में हमनें हिंदी को इतना महत्व क्यों दिया? यही सवाल इस विरासत के इतिहास की तरफ इंगित करता है। चलिए जानते हैं हिंदी का  ”हिंदी जी” और फिर से हिंदी तक का सफरनामा। लगभग 1000 साल पुरानी हिंदी का चलन भारत के उत्तरी भाग से हुआ है। वैसे हिंदी के इतिहास को समझने के लिए, हमें भारत में संचार की शुरुआत के बारे में जानना उतना ही ज़रूरी है जितना दौड़ने के लिए चलना। आर्य भाषा या देव भाषा भारत की सबसे प्राचीन भाषा है, जिसे हम संस्कृत नाम से जानते हैं। माना जाता है कि, हिंदी भाषा संस्कृत की कोख़ से जन्मी है। संस्कृत 1000 ईसवीं से 1100 ईसवीं तक संचार का माध्यम बन चुकी थी, इसके उपरांत यह दो भाषाओं में विभाजित हुई – वैदिक और लौकिक। वैदिक भाषा में वेद और उपनिषेद का वर्णन किया गया और लौकिक में ग्रंथो का जिक्र आता है। रामायण, महाभारत, व्याकरण आदि ग्रंथ इस भाषा में लिखे गए हैं। संस्कृत भाषा के बाद 500 ईसवीं से पहली शताब्दी तक पाली भाषा आती है। इस भाषा में बौद्ध ग्रंथों की रचना हुई। पाली के बाद प्राकृत भाषा का उदय हुआ जिसमें जैन साहित्य अधिक मात्रा में लिखे गए। धीरे -धीरे यह बोलचाल की भाषा में बदल गयी और इसे सहज रूप से बोला और समझा जाने लगा। प्राकृत भाषा से अपभ्रंश भाषा की उत्पत्ति हुई और उस से ही आम जन सहज रूप से बोल चाल की भाषा के रूप में प्रयोग करने लगे जिसे अव्हट कहा गया। हिंदी भाषा की उत्पत्ति पर विद्वानो में अभी तक मतभेद है कुछ का मनना है कि हिंदी अपभ्रंश से विकसित हुई वहीं कुछ विद्वान् मानते हैं कि हिंदी, अव्हट से जन्मी। इसके बाद से हिंदी पूरे देश में कवियों, लेखकों और साहित्य के माध्यम से एक होती गयी। पूरे देश को एक सूत्र में बांधने का महत्वपूर्ण काम हिंदी ने किया। स्वतंत्रा संग्राम में हिंदी ने हमारे संग्रामियों के हौसलों में जान फूँकने का काम किया, यही कारण है भारत के आजाद होने के बाद अनेक राजनेता इसे राष्ट्रभाषा के रूप में देखने लगे थे, जिसे 14 सितम्बर 1949 को पूर्ण कर दिया गया। यह हिंदी भाषा के सफर की शुरुआत थी। 

हिंदी से ‘’हिंदी जी’’ और फिर से हिंदी तक का सफर
  
अब चलिए जानतें है कि हिंदी जी किस तरह विकसित हुईं, भारत के बहुसंख्यक हिंदी को मातृभाषा के रूप में उपयोग करते हैं। यहां तक कि विश्व में बोले जाने वाली भाषाओं में हिंदी तीसरे स्थान पर है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारी विरासत कितनी अनमोल और फैली हुई है। हिंदी भाषा में अपनत्व है, भावना है और हमारी संस्कृति है। हम संस्कृत से शुरू हुए और उसी से विकसित हिंदी हमारे जीवन की मूल वास्तविकता को निरंतर रूप से संचालित कर रही है। लेकिन अब हिंदी का स्वरुप ढलता जा रहा है, कहने को तो हिंदी हमारी आधिकारिक भाषा है, लेकिन शाायद ही हम उसे उतनी इज्ज़त दे पाए हैं ।

 
अंग्रेजी बाबू के आगे हिंदी जी क्यों शर्मा जाती हैं ?

ज़मीनी हकीकत यह है कि सरकारी दफ्तर में हिंदी जी अभी तक बहुत आगे नहीं बढ़ पायी हैं। उनका इस्तेमाल केवल अंग्रेजी को ट्रांसलेट कर के किया जाता है। जब आप हिंदी को ट्रांसलेट कर के पढ़ेंगे तो वो देखने में लुभावनी लगेगी लेकिन समझने में कठिन महसूस होगी। अंग्रेजी को हिंदी में बदल देने से नहीं, बल्कि हिंदी जी को व्यवहार में लाने से हम उनका मान-सम्मान बढ़ा सकते हैं। हिंदी जी की एक अपनी पहचान है हालांकि आधुनिक समय में समाज में उनकी पहचान पर सवाल उठते रहते हैं। किसी भी इंसान की बोलचाल ही उसे प्रभावशाली बनाती है अक्सर जब भी हम चार लोगों में किसी व्यक्ति के मुंह से टूटी-फूटी, बेढंग अंग्रेजी बाबू को सुन लेते हैं, तो हमारे अंदर उनके लिए सम्मान की भावना उत्पन्न होती है। वहीं बेचारी हिंदी जी शर्म से मुंह से निकल ही नहीं पाती। बचपन से ही अंग्रेजी बाबू को सीखाने के लिए अभिभावक बच्चो को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए पहले खुद अंग्रेजी बाबू को सीखते हैं। बचपन से ही बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के चलते खिचड़ी भाषा सिखाने लगते हैं। “बेटा sleep कर लो”, बेटा bath कर लो, “बेटा वो देखो crow”। बचपन में बच्चो की सीखने की क्षमता तीव्र होती है, उस समय बच्चा वही सीखेगा जो उसे सिखाया जाएगा। यही वजह है कि बड़े होने पर ना हम ढंग से अंग्रेजी बाबू बन पाते हैं और न ही हिंदी जी को सम्मान दिला पाते हैं। हिंदी जी नहीं आती तो कोई बात नहीं लेकिन अंग्रेजी बाबू नहीं आते तो समाज मे कैसे उन्नति हासिल करेंगे ये सवाल किया जाता है। अंग्रेजी बाबू कोई दुश्मन नही हैं ,लेकिन हिंदी जी को नीचा दिखाना ये गलत है। हिंदी जी को सम्मान क्यों नही मिलता? उन्हें पैसे कमाने के जरिये में मीडिया इस्तेमाल करती है, सिनेमा विभाग भी सालाना अच्छी कमाई कर लेता है। लेकिन जब अदाकारों से सवाल पूछे जाते हैं, तो अंग्रेजी बाबू को इस्तेमाल करते हैं, जिससे यह साबित हो जाये कि वे मॉडर्न हैं। 

आधुनिक युग में युवा पीढ़ी हिंदी जी को एकदम भूल चुकी है। हिंदी न आने से उन्हें गर्व और अंग्रेजी न बोल पाने से शर्म महसूस होती है। विद्यार्थी ने जब यह बोला कि – “मैं रोज विद्यालय जाता हूँ”, तो लोगों ने कोई भाव नहीं दिया बल्कि उसे अनसुना कर दिया। वहीं जब उसने अंग्रेजी बाबू “I go to the school” बोला तो उसको सम्मान की नजरों से देखा गया। एक बार हमने कहा कि हम हिंदी बोलते हैं, हमें अंग्रेजी नहीं आती, तो हमें बहुत घंटों तक अंग्रेजी बाबू के बारे में बताया गया और यह कहा गया कि केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में हिंदी का बोलबाला है। इसलिए जितना जल्दी हो सके इनको सीख लो। अन्यथा जीवन में आगे बढ़ने में मुश्किल होगी, फिलहाल ये बात सच भी हुई। हिंदी जी को आम बोलचाल में इस्तेमाल किया जाता है, हम रोज बोलते भी हैं लेकिन उनका उतना भाव अब नहीं है। जब भी हमें समाज में साबित करना होता है कि हम पढ़े-लिखे हैं या मॉडर्न हैं, तो झट से अंग्रेजी के टूटे-फूटे चार शब्द जोश के साथ बोल ही देते हैं। हिंदी जी को मानने वाले उन्हें समाज में इज्ज़त नहीं दिला सके। भावी पीढ़ी अब हिंदी जी को शायद ही समझ पाएगी, जिसे समझ आएगी उसे शर्म आएगी। 

मुद्दा यह नहीं है कि अंग्रेजी बाबू का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? बल्कि यह है कि हिंदी जी को शर्म क्यों आती है? क्या आपको हिंदी जी पर भरोसा नहीं ?  क्या इस भाषा में वो खूबी नहीं, जो अंग्रेजी बाबू में है? क्यों समाज मे हिंदी जी की तुलना में अंग्रेजी बाबू को ज्यादा सम्मान दिया जाता है। क्या हिंदी बोलने वाला अज्ञानी है? अपने विचारों को दूसरे के विचारों को समझने और व्यक्त करने के लिए भाषा तो मात्र एक माध्यम है। लेकिन क्या हम इस परिभाषा को अपनी ज़िन्दगी में उतार पाए हैं ? क्यों अंग्रेजी बाबू को ज्यादा मान मिलता है, चाहे उनकी बातें अज्ञानता से ही भरी हों और वहीं  हिंदी जी मुँह से शर्म के मारे निकल नहीं पाती चाहें वह कितनी ज्ञानी हो। 

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