आयुर्वेदिक ज्ञान, चिकित्सीय गुणों की खान

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आयुर्वेद भारत का सबसे प्राचीन औषधीय चिकित्सा प्रणाली है। आयुर्वेद का इतिहास अत्यंत समृद्ध और व्यापक है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों से उपयुक्त है। यह मात्र रोग के इलाज में ‌मदद‌ में ही नहीं करता है, बल्कि किसी बीमारी को जड़ से खत्म करने में मदद करता है। व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक गुणों को विकसित करने में आयुर्वेद का महत्त्वपूर्ण योगदान है। #Thinkwithniche

आयुर्वेद भारत का सबसे प्राचीन औषधीय चिकित्सा प्रणाली है। आयुर्वेद का इतिहास अत्यंत समृद्ध और व्यापक है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों से उपयुक्त है। चिकित्सा के क्षेत्र में इसका बहुत बड़ा महत्त्व है। यह मात्र रोग के इलाज में ‌मदद‌ में ही नहीं करता है, बल्कि किसी बीमारी को जड़ से खत्म करने में मदद करता है। व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक गुणों को विकसित करने में आयुर्वेद का महत्त्वपूर्ण योगदान है। आज‌ की आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के मुकाबले आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली अधिक प्रभावी मानी जाती है। लोगों में भी आयुर्वेदिक उत्पादों के प्रति मांग में तेजी से वृद्धि हुई है। इसके अलावा सरकारों ने भी इन‌ उत्पादों को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा कर रही है। अतः यह कहा जा सकता है कि चिकित्सा क्षेत्र में आयुर्वेद की भूमिका अन्य किसी भी चिकित्सा प्रणाली से कहीं अधिक प्रभावी है।

आयुर्वेद का इतिहास

आयुर्वेद को लगभग 5000 वर्ष पुरानी औषधीय प्रथा माना जाता है।‌ आयुर्वेद शब्द दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है- “आयुष अर्थात जीवन” और “वेद का अर्थ है ज्ञान”। इसी कारण आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है। यह न केवल शरीर को स्वस्थ जीवन जीने में मदद करता है, बल्कि मन को सही दिशा में ले जाने पर‌ भी ध्यान केंद्रित करता है। यह शरीर को रोगों और विकारों से मुक्त कर स्वास्थ्य को स्वस्थ्य रखने में सहायक होता है। जीवन‌ को लंबा रखने में भी यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान धनवंतरि को आयुर्वेद का दिव्य प्रचारक माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान धनवंतरि की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी, जिनके एक हाथ में अमृत कलश और दूसरे हाथ में आयुर्वेदिक जानकारियों वाला पवित्र पाठ था। उन्हें देवताओं का वैद्य माना जाता है। इसी कारण धनतेरस को भगवान धनवंतरि की जयंती के रूप में मनाया जाता है। 

आयुर्वेद का महत्त्व

आयुर्वेद विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणाली मानी‌ जाती है। यह आत्मा और शरीर के बीच संबंध स्थापित करने में मदद करता है। पारंपरिक चिकित्सा का मानना है कि आत्मा और शरीर के बीच का संतुलन बीमारियों को रोकने में मदद करता है, गंभीर स्थितियों के इलाज में मदद करता है और स्वस्थ जीवन में अपना योगदान देता है। पश्चिमी चिकित्सा की तरह आयुर्वेद सिर्फ एक चिकित्सा प्रणाली नहीं है, बल्कि यह बीमारियों का जड़ से इलाज करता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा ने हजारों वर्षों से मनुष्य को स्वस्थ बनाए रखने और बीमारी से बचने के अनेक प्राकृतिक साधन प्रदान किए हैं। आज अनेकों केमिकल उत्पादों का उपयोग त्वचा के लिए किया जाता है जो त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं आयुर्वेद प्राकृतिक त्वचा उपचार कर‌ त्वचा को स्वस्थ और संतुलित करता है। आयुर्वेद “अष्टविधि रोगी परीक्षा” के द्वारा व्यक्तिगत दोषों को समझने और स्थायी इलाज में मदद करता है। आयुर्वेद व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक गुणों के रूप में समझने में मदद करता है।

आयुर्वेद का मानना है कि रोकथाम इलाज से बेहतर है। अतः यह बीमारियों को जड़ से खत्म करने के साथ-साथ भविष्य में होने वाली समस्याओं को भी नियंत्रित करता है।

आयुर्वेद उपचारों में न केवल जड़ी-बूटियॉं शामिल होती हैं बल्कि अन्य पदार्थ जैसे शहद, दूध, घी, मक्खन, तेल, राख इत्यादि भी शामिल होते हैं। हालांकि इन सभी में जड़ी-बूटियॉं मुख्य रूप से शामिल होती हैं। अन्य पदार्थों का उपयोग व्यक्तिगत रूप से शारीरिक संरचना, बीमारी और उपचार पर निर्भर करता है। आयुर्वेद व्यक्ति की जीवनशैली को खास महत्त्व देता है और उसकी गुणवत्ता में सुधार के लिए उचित आहार, शारीरिक व्यायाम, मानसिक स्वास्थ्य और दिनचर्या पर विशेष रूप से ग़ौर करता है।

एलोपैथिक उपचार बनाम आयुर्वेद

आयुर्वेद भारत की सबसे प्राचीन पारंपरिक शिक्षा चिकित्सा प्रणाली होने के बावजूद भी इसे सबसे सुरक्षित, प्रभावी और कम लागत वाला उपचार माना जाता है। महंगी पश्चिमी दवाओं की तुलना में आयुर्वेदिक दवाओं को उचित और सस्ता माना जाता है। यहां तक कि कुछ दवाइयों को तो घरों में मौजूद सामग्रियों से भी बनाया जा सकता है, जो अत्यंत आसान और सुविधाजनक होती हैं। पश्चिमी दवाइयों की तुलना में आयुर्वेदिक चिकित्सा दुष्प्रभावों से रहित होती है। इनमें प्राकृतिक जड़ी बूटियों का समावेश होने के कारण यह पूरी तरह से रसायनरहित होती हैं। आधुनिक चिकित्साओं द्वारा रोगों में तेजी से राहत देने की क्षमता के कारण अत्यधिक वैश्विक आबादी आयुर्वेद को छोड़ आधुनिक चिकित्सा को अपनाने लगी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आयुर्वेद को लेकर लोगों में जागरूकता उत्पन्न हुई जिसका मुख्य कारण एलोपैथिक दवाइयों का दुष्प्रभाव है। निःसंदेह, एलोपैथिक उपचार की तुलना में, अधिकांश पुरानी बीमारियों में आयुर्वेदिक उपचार अधिक प्रभावी होता है। 

आयुर्वेदिक उत्पादों की बढ़ती मांग

पिछले कुछ वर्षों में, आयुर्वेदिक चिकित्सा की मांग में काफी बढ़ोतरी हुई है। लोग इसके महत्त्व को समझने लगे और इन्हें उपचार के रूप में अपनाने लगे हैं। ख़ासकर कोरोना के वैश्विक महामारी के बाद से आयुर्वेद के महत्व को सभी समझ चुके हैं। शरीर की‌ रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए लोग अनेक आयुर्वेदिक उत्पादों का उपयोग भारी मात्रा में करने लगे हैं। न केवल आयुर्वेदिक खाद्य उत्पादों, दवाइयों में बल्कि आयुर्वेदिक सौंदर्य उत्पादों की खपत में भी काफी वृद्धि देखने को मिली। आम लोगों के साथ-साथ सरकारों द्वारा भी आयुर्वेदिक उत्पादों को लेकर जागरूकता देखने को मिल रही है। यहॉं तक कि प्रति वर्ष धनतेरस को “राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस” के रूप में मनाया जाता है। उत्पादों की बढ़ती मांग और लोकप्रियता के कारण आयुर्वेदिक उद्योगों को भारी मुनाफा हुआ। हालांकि यह परिणाम अवश्य ही सकारात्मक है, जो हमें हमारे प्राचीन संस्कृतियों को जीवित रखती है। यह इस बात को भी दर्शाता है कि चाहें हम आधुनिकता से कितना भी परिपूर्ण हो जाएं, लेकिन हमारी पारंपरिक प्राचीन प्रणालियां आज‌ की आदरणीय प्रणालियों से कहीं अधिक बेहतर और प्रभावी हैं।

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