प्रकृति को समर्पित तुलसी गौड़ा

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इतनी विविधताओं के बाबजूद भी कुछ लोग अपना सम्पूर्ण जीवन प्रकृति एवं समाज को समर्पित कर देते हैं। दुनिया में ऐसे कई उदारण हैं जो प्रकृति को इतना प्रेम करते हैं कि वे उसी के लिए जीते हैं उसी के लिए मर जाने तक का हौसला रखते हैं। ऐसा ही एक नाम जो हम सभी की प्रेरणा का जीता जागता उदाहरण बना है, वह नाम है तुलसी गौड़ा जी का। #Thinkwithniche

जीवन और मृत्यु ईश्वर की मर्जी है। पैदा होने वाला व्यक्ति कितनी ख्याति पायेगा यह सब वक्त पर निर्भर करता है और कौन इंसान सिर्फ मनुष्यों human का मानसिक शोषण mental exploitation करने को पैदा हुआ है, इसकी जानकारी सिवाय वक़्त के और कोई नहीं जानता। मनुष्य के कृत्य ही मनुष्य की असली पहचान बनती हैं। जहाँ एक ओर प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी ज़िन्दगी को सवारनें में लगा हुआ है, चाहें फिर वह छोटे से छोटा आदमी हो या फिर बड़े से बड़ा। इतनी विविधताओं के बाबजूद भी कुछ लोग अपना सम्पूर्ण जीवन, प्रकृति एवं समाज को समर्पित कर देते हैं। दुनिया में ऐसे कई उदारण हैं जो प्रकृति को इतना प्रेम करते हैं कि वे उसी के लिए जीते हैं उसी के लिए मर जाने तक का हौसला रखते हैं। ऐसा ही एक नाम जो हम सभी की प्रेरणा का जीता-जागता उदाहरण बना है, वह नाम है तुलसी गौड़ा जी का। tulsi-gowda जी सबकी प्रेरणा हैं।  

तुलसी गौड़ा जी ने अपने अब तक जीवन काल में 30 हज़ार से भी अधिक पौधा रोपण plantation कर पुरे भारत देश को प्रकृति के प्रति प्रेम का अध्भुत कारनामा पेश किया है। तुलसी जी अधिक चर्चा में तब आयीं जब भारत के राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 2021 का पद्मश्री पुरस्कार उनको उनके सम्मानित कृत्य के चलते दिया गया। देखने वाली बात ये भी रही की अपनी सादगी, अपनी वेशभूषा, अपने पारम्परिक परिधान को धारण कर वे भवन में पुरस्कार लेने पहुंचीं। बात यहाँ तक भी ठीक थी परन्तु एक बात जो वहां के लोगों को उनकी तरफ अधिक आकर्षित की, वह थी उनका नंगे पाव भवन में प्रवेश करना। उनकी इस सादगी के चलते पूरा भारत उनका कायल हो गया। 

आइये जानते हैं कौन हैं तुलसी जी 

खैर अब तक पूरी दुनिया ये जान ही चुकी है कि तुलसी जी प्रकृति प्रेमी हैं। परन्तु उनके बारे हम कितना जानते हैं ये भी एक आवश्यक प्रश्न है? और इसका उत्तर हम सभी जानने के इक्षुक हैं। तो आइये जानते हैं,

तुलसी गौड़ा जी का जन्म होनाल्ली गांव के हलक्की आदिवासी परिवार में सन 1944 में हुआ। आप कर्नाटक में उत्तर कन्नड़ जिले की वासी हैं। घर में चलती विषम परिस्थितयों के चलते पढ़ाई बहुत कम ही कर पायीं। कहा जा सकता है कि तुलसी जी न के बराबर पढ़ी लिखी हैं 

तुलसी जी के जन्म के 2 वर्ष बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिससे उन्हें अपनी मां के साथ एक स्थानीय नर्सरी में एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम की शुरुआत करनी पड़ी, जिसके कारण उन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने से रोक दिया गया। शिक्षा की कमी के कारण, वह अनपढ़ ही रह गयीं, जिस वजह से वह पढ़ने-लिखने में सक्षम नहीं है। उनकी जनजातीय भाषा कन्नड़ है, जिसे आमतौर पर कनारिस के नाम से जाना जाता है। कम उम्र में इनकी शादी गोविंदे गौड़ा नाम के एक बड़े आदमी से कर दी गई थी, तब इनकी उम्र लगभग 10 से 12 साल की थी। जब तुलसी जी 50 वर्ष की थीं, तब उनके पति की मृत्यु हो गई। नर्सरी में, गौड़ा कर्नाटक वानिकी विभाग में उगाए और काटे जाने वाले बीजों की देखभाल का कार्य करती थीं और वह विशेष रूप से उन बीजों की देखभाल करती थीं, जो कि अगासुर सीड बेड का हिस्सा बनने के लिए थे। गौड़ा ने 35 वर्षों तक अपनी मां के साथ दिहाड़ी मजदूर के रूप में नर्सरी में काम करना जारी रखा, उसके बाद उनके इसी काम को वनस्पति विज्ञान के संरक्षण और व्यापक ज्ञान के लिए एक स्थायी पद सौंप दिया गया। इसके बाद उन्होंने नर्सरी में अपनी स्थायी स्थिति के साथ 15 और वर्षों तक काम किया। 70 साल की उम्र में सेवानिवृत्त retirement होने का फैसला किया। इस नर्सरी में अपने पूरे समय के दौरान, उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से प्राप्त भूमि के अपने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करके वन विभाग द्वारा वनीकरण के प्रयासों का काम और सुद्रर्ण किया। 

तुलसी जी की कड़ी मेहनत और प्रकृति के प्रति लगन ने उन्हें आज इस छवि के रूप में प्रदर्शित किया कि पूरी दुनिया उनकी कायल हो गयी है। भारत को ऐसे प्रकृति प्रेमी की अति आवश्यकता है।

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