शहीद दिवस – वीर क्रांतिकारियों को नमन

आज हमारा देश तो विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है लेकिन जो इन सभी उपलब्धियों की वजह हैं, आजादी के वो अग्रदूत उन्हें हम भूलते जा रहे है। वीर सपूतों ने भारत की आजादी के लिए बहुत संघर्ष किये और हमे आजादी भी मिल गयी पर सोचने वाली बात ये है कि आज हम अंग्रेजों से तो आजाद हैं, पर क्या हम लालच, भ्रष्टाचार, गरीबी व पिछड़ी सोच से आजाद है? हालांकि, ये एक अलग मुद्दा है बदलाव का, तरक्की का, पर ये भी कहीं न कहीं इसी आजादी के पहलु से जुड़ा हुआ है। अभी बात करते हैं क्रांतिकारियों के संघर्षों के बारे में, उनके प्रयासों और हक़ की लड़ाई के बारे में।

चलिए शुरू करते हैं

ब्रिटिश हुकूमत से आजादी हासिल करने के लिए भारत में 1857 से लेकर 1947 तक कई जन आंदोलन चले, ऐसे कई वीर महापुरुष हैं जिन्‍होंने देश को आजादी दिलाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। आइए जानते हैं आजादी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में जिसके रास्तों से गुजरकर हमे आजादी मिली।

हम कितने सीधे और आसान तरीके से ये शब्द ‘आजादी’ कह देते हैं, पर ये उतनी आसानी से हमे मिली नहीं।

भारत की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन दो प्रकार का था, एक अहिंसक आन्दोलन एवं दूसरा सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन। भारत की आज़ादी के लिए 1857 से 1947 के बीच जितने भी प्रयत्न हुए, उनमें स्वतंत्रता का सपना संजोये क्रान्तिकारियों और शहीदों की उपस्थित सबसे अधिक प्रेरणादायी सिद्ध हुई। भारत की धरती पर जितनी भक्ति और मातृ-भावना उस युग में थी, उतनी कभी नहीं रही। मातृभूमि की सेवा और उसके लिए मर-मिटने का जो जूनून था , आज उसका बहुत अभाव है। क्रांतिकारी आंदोलन का समय सामान्यतः सन् 1857 से 1942 तक माना जाता है।

भारत की आजादी का इतिहास

सन 1757 में प्लासी के युद्ध भारत में राजनीतिक सत्ता जीतने पर के बाद अंग्रेजों ने भारत पर अपना आधिपत्य जमा लिया और करीब 200 साल तक राज किया। वर्ष 1848 में लाॅर्ड डलहौजी के कार्यकाल के दौरान यहां अंगेजों का शासन स्थापित हुआ। अंग्रेजों के निशाने पर सबसे पहले उत्तर-पश्चिमी भारत रहा और वर्ष 1856 तक उन्होंने अपना मजबूत अधिकार स्थापित कर लिया। 19वीं सदी में अंग्रेज अपने शासन में अधिक बुलंद हो गए। अंग्रेजों की मनमानी से तंग आकर नाराज़ और असंतुष्ट स्थानीय शासकों, किसानों और बेरोजगार सैनिकों ने विद्रोह कर दिया जिसे आमतौर पर ‘1857 का विद्रोह’ या ‘1857 के गदर’ के रूप में जाना जाता है। 1857 में इस विद्रोह की शुरुआत मेरठ में बेरोजगार सैनिकों के विद्रोह से हुई।

इस विद्रोह का मुख्य कारण वो नए कारतूस थे जो नई एनफील्ड राइफल में लगते थे। इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी से बना ग्रीस था जिसे सैनिक को राइफल इस्तेमाल करने के लिए मुंह से हटाना होता था। जोकि हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के सैनिकों को धार्मिक कारणों के चलते मंजूर नहीं था और उन्होंने इसे इस्तेमाल करने से मना कर दिया और यही वजह थी जिसके कारण उनके रोजगार छीन लिए गए। जल्दी ही यह विद्रोह दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों में फ़ैल गया, लेकिन यह विद्रोह असफल रहा और अंग्रेजों की सेना ने इस विद्रोह के जबाब में कई हत्याएं कर दीं। जिससे भारतीय नागरिक बहुत निराश हो गए। अंग्रेजों और भारतीयों के इस विद्रोह ने दिल्ली, अवध, रोहिलखंड, बुंदेलखंड, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। हालांकि तब भी 1857 का यह विद्रोह असफल कहलाया और एक साल के भीतर ही खत्म भी हो गया। 1857 के विद्रोह के बाद एक साल में ही अंग्रेजों ने विद्रोह पर काबू पाकर नई नीतियों के साथ फिर से अपना विस्तार किया। और उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत हो गया। इसी बीच महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी के तौर पर घोषित किया गया। तमाम बंदिशों के वाबजूद कई देशभक्त निकल कर विद्रोह के लिए सामने आये जैसे राजा राम मोहन राय, बंकिम चंद्र और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारक पटल पर उभरे और उन्होंने भारतीयों के हक की लड़ाई लड़ी।

भारत को स्वतंत्र कराने के लिए तमाम लोगों ने बलिदान दिए अगर मैं शुरू से उसके बारे में बात करने जाऊं तो मेरे शब्द कम पड़ जाएंगे। जैसा कि हम जानते हैं कि आज शहीद दिवस है तो आज बात करते हैं उन वीर अमर शहीदों की जिन्होंने अपना सारा जीवन देश को समर्पित कर दिया।

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