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आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी का विशिष्ट योगदान

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इस साल भारत ब्रिटिश शासन से अपनी आजादी के 75 साल 75th Anniversary Of Independence पूरे करेगा। भारत की स्वतंत्रता देश के उन अविस्मरणीय वीरों के अथक प्रयासों का परिणाम है जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राण भी न्यौछावर कर दिए। सबने अपने अपने तरीके से आज़ादी के संग्राम में अपनी भूमिका निभायी और भारत को आजाद कराने में अपना योगदान दिया । ऐसी ही एक अमर आत्मा जिसे लोग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते है ।

महात्मा गांधी जी का मानना था कि हिंसा से जीतने के लिए हिंसा नहीं बल्कि अहिंसा का मार्ग चुनना चाहिए। गांधी जी ने अहिंसा और सत्य Truth and Non-violence को हिंसा के खिलाफ लड़ने के लिए दो सबसे अहम हथियार बताया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, चंपारण आंदोलन जैसे स्वतंत्रता आंदोलनों के माध्यम से वह हमेशा मानवाधिकारों के लिए खड़े रहे। बापू ना सिर्फ पिछड़ी पीढ़ी के लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी विचारधारा की वजह से एक सच्ची प्रेरणा है। बापू ने यह सीख दी है कि अहिंसा, सत्य, और सहिष्णुता समाज कल्याण के सबसे बड़े हथियार हैं।

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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन Indian Independence movement में महात्मा गांधी Mahatma Gandhi के योगदान के बारे में बात करने लगे, तो शब्द कम पड़ जाएंगे। देश अंग्रेजों से परेशान था, देशवासियों को अंग्रेजों के प्रति गुस्सा था लेकिन फिर भी गांधी जी ने अहिंसा Ahimsa की मदद से देश को आज़ादी दिलाई। 1919 से 1948 तक भारतीय राजनीतिक मंच पर गांधी जी कुछ इस तरह छाए कि इस युग को गांधी युग Gandhi Yug (1919–1948) कहा जाता है। आज जब पूरा देश आज़ादी की 75th वर्षगांठ 75th Anniversary Of Independence मना रहा है और इस उपलक्ष में आज़ादी का अमृत महोत्सव Azadi Ka Amrit Mahotsav एक प्रमुख आयोजन बन गया है जिससे देश का हर नागरिक जुड़ रहा है । इस समय गांधी और उनके विचार बहुत ज्यादा प्रासंगिक हैं ।

उनका मानना था कि हिंसा से जीतने के लिए हिंसा नहीं बल्कि अहिंसा का मार्ग चुनना चाहिए। गांधी जी ने अहिंसा और सत्य Truth and Non-violence को हिंसा के खिलाफ लड़ने के लिए दो सबसे अहम हथियार बताया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, चंपारण आंदोलन जैसे स्वतंत्रता आंदोलनों के माध्यम से वह हमेशा मानवाधिकारों के लिए खड़े रहे। बापू ना सिर्फ पिछड़ी पीढ़ी के लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी विचारधारा की वजह से एक सच्ची प्रेरणा है। बापू ने यह सीख दी है कि अहिंसा, सत्य, और सहिष्णुता समाज कल्याण के सबसे बड़े हथियार हैं।

जब अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए गांधी जी विदेश गए थे, तभी वह यह समझ गए थे कि अंग्रेजों के शासन की वजह से भारतीयों का जीवन बेहद कष्टदायक हो गया है। भारतीयों के पास अंग्रेजों को हराने के लिए कोई विशेष शक्ति नहीं थी और इसीलिए उन्हें अपमान भरा जीवन बिताना पड़ रहा था लेकिन गांधी जी को ये मंजूर नहीं था।

कम ही लोग जानते हैं कि सत्याग्रह Satyagraha की शुरुआत गांधी जी ने सबसे पहले भारत में नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका में की थी और दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने से पहले ही भारतवासी गांधी जी को जान चुके थे। गांधी जी लंबे समय तक दक्षिण अफ्रीका में रहे और इसी बीच कभी-कभी वह भारत भी आते थे। उनका गोपाल कृष्ण गोखले Gopal Krishna Gokhale और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक Bal Gangadhar Tilak जैसे महान नेताओं से घनिष्ठ परिचय था।

ऐसा कहा जाता है कि जब आपको कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तो आपका जीवन अपने आप ही बदल जाता है क्योंकि कठिनाइयों हमें बहुत कुछ सीखाती हैं। ऐसा ही कुछ गांधी जी के साथ भी हुआ था। दरअसल, बात 1893 की है जब मोहनदास करमचंद गाँधी, दादा अब्दुल्ला नामक व्यापारी के विधि सलाहकार के रूप में काम करने के लिए डरबन गए थे। वहां उन्होंने देखा कि भारतीयों और ब्लैक अफ्रीकंस के साथ जातीय भेदभाव racial discrimination होता है। वह अफ्रीका काम करने के लिए गए थे लेकिन यहां कई बातों ने उनका जीवन पूरी तरह से बदल दिया। एक बार न्यायालय के दंडाधिकारी ने उन्हें अपनी पगड़ी निकालने को कहा था लेकिन उन्होंने ऐसा करने से साफ मना कर दिया और वह न्यायालय से बाहर आ गए।

31 मई, 1893 को प्रिटोरिया जाने के दौरान भी गांधी की को जातीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। दरअसल, एक श्वेत व्यक्ति को गांधी जी के ट्रेन के प्रथम श्रेणी में यात्रा करने से आपत्ति थी और उसने गांधी जी को ट्रेन के अंतिम डिब्बे में जाने को कहा जिसपर गांधी जी ने अपना प्रथम श्रेणी का टिकट दिखाया और ट्रेन के अंतिम डिब्बे में सफर करने से साफ मना कर दिया। हद तो तब हो गई जब उन्हें पीटमेरित्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर उतार दिया गया। उस वक्त शर्दी का मौसम था और गांधी जी अगली ट्रेन की प्रतीक्षा में ठंड से ठिठुरते रहे और उन्होंने उसी समय यह निर्णय लिया कि जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करेंगे। गांधी जी ने अहिंसात्मक रूप से अपना विरोध जताया, जिसे सत्याग्रह के नाम से जाना गया। आज भी उस शहर के चर्च स्ट्रीट में गांधी जी की कांस्य मूर्ति है।

आइए आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के विशिष्ट योगदान के बारे में जानते हैं-

Major Movements Of Mahatma Gandhi That Helped In The Indian Freedom Struggle

1. चंपारण सत्याग्रह,1917 Champaran Satyagraha

बिहार के चंपारण जिले में तिनकथिया प्रथा के चलते किसानों को नील की खेती करनी पड़ रही थी और उनकी स्थिति दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही थी। दरअसल, किसानों को अपनी जमीन के सबसे उपजाऊ 3/20 वें हिस्से पर नील की खेती करनी पड़ती थी और उस नील को बेहद ही सस्ते दामों पर अंग्रेजों को बेचने के लिए मजबूर किया जाता था। सिर्फ इतना ही नहीं उन्हें अंग्रेजों को भारी टैक्स भी देना पड़ता था और खराब मौसम के चलते किसानों की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही थी।

किसान नील की खेती करने के लिए भारी भरकम कर्ज़ लेते थे और नील को बेचने पर उन्हें जो कीमत मिलती थी, वह बेहद कम थी। नील की खेती करने से एक और बड़ी समस्या थी। जिस खेत पर नील उगाया जाता है, वह भूमि बंजर हो जाती है और इसके बाद वह जमीन इतनी उपजाऊ नहीं रहती कि आप उस भूमि पर कुछ और उगा पाओ। अंग्रेज इस बात को बखूबी जानते थे इसीलिए वह भारत में नील की खेती करवाते थे और यहां के किसानों से बहुत ही कम दाम में नील खरीदते थे। अंग्रेजों के इस मनमानेपन के कारण चंपारण के किसान बेहद परेशान थे। इन्हीं कारणों के चलते राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी से मुलाकात की और उन्हें चंपारण आने के लिए आमंत्रित किया। गांधी जी ने किसानों की सारी समस्या सुनी और भारत में पहली बार सविनय अवज्ञा आंदोलन Civil disobedience movement का रुख अपनाया। जमींदारों के खिलाफ हड़ताल और प्रदर्शन किए और सरकार ने चंपारण कृषि समिति का गठन किया। इस कृषि समिति में गांधी जी भी थे। फिर क्या, गांधी जी को यहां सफलता मिली और किसानों की सभी मांगे मान ली गईं और भारत में सत्याग्रह सफल रहा।

2. खेड़ा आंदोलन (22 मार्च, 1918- 5 जून, 1918) Kheda Movement

1918 की बात है जब गुजरात के खेड़ा नामक गांव में बाढ़ आ गई थी और इससे परेशान होकर वहां के किसानों ने शासकों से टैक्स माफ करने की अपील की थी। गांधी जी ने हस्ताक्षर अभियान शुरू किया और स्थानीय किसानों ने टैक्स का भुगतान ना करने का संकल्प लिया। ब्रिटिश सरकार ने किसानों की मांगों को माना और कर को कम किया। इस आंदोलन में बापू का साथ इंदुलाल याज्ञनिक और सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी दिया था।

3. असहयोग आंदोलन 1920 Non-Cooperation Movement

1920 में असहयोग आंदोलन को शुरू करने के पीछे जलियावालां बाग हत्याकांड Jallianwala Bagh massacre 13 April,1919 एकमात्र कारण था। 13 अप्रैल, 1919 में जो भी हुआ उसने बापू की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। गांधी जी ये जानते थे कि असहयोग आंदोलन को शुरू करने का इससे अच्छा वक्त नहीं है क्योंकि भारतीयों के मन में अंग्रेजों को लेकर काफी क्रोध भरा हुआ है। गांधी जी का ये मानना था कि शांतिपूर्ण तरीके से असहयोग आंदोलन का पालन करना ही देश को आज़ादी के करीब ले जा पाएगा।

जैसा गांधी जी ने सोचा था वही हुआ और असहयोग आंदोलन ने रफ्तार पकड़ ली। भारतीयों ने अंग्रेजों द्वारा संचालित किए गए स्कूल, कॉलेज और सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया।

इस आंदोलन की शुरुआत 1 अगस्त, 1920 को हुई थी लेकिन फरवरी 1922 में चौरी-चौरा घटना हुई और गांधी जी ने इस आंदोलन को स्वयं ही समाप्त कर दिया। चौरी-चौरा, उत्तर प्रदेश की घटना में 22 पुलिस अधिकारियों को जिंदा जला दिया गया था।

4. नमक सत्याग्रह Salt Satyagraha 12 मार्च, 1930

अंग्रेजी शासन में भारतीयों को नमक बनाने की इजाज़त नहीं थी और इसीलिए हर भारतीय को इंग्लैंड से आया हुआ नमक इस्तेमाल करना पड़ता था। यहां तक तो फिर भी ठीक था लेकिन अंग्रेजों ने नमक पर कई गुना टैक्स लगा दिए थे। नमक एक आवश्यक वस्तु है और नमक पर लगे इस टैक्स को हटाने के लिए गांधी जी ने नमक सत्याग्रह चलाया था।

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